अघोषित बिजली कटौती से किसानों की फसल सूखने की कगार पर

ग्रामीण इलाकों में विद्युत की अघोषित कटौती, फसल सूखने से चिंतित किसान

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संवाददाता – मनोज उमरे की रिपोर्ट…..

धूमा। भारत एक कृषि प्रधान देश है और पूरी दुनिया भर में भारत कृषि प्रधान के नाम से जाना जाता है। जहां एक ओर केंद्र एवं राज्य की सरकारें कृषि को बढ़ावा देकर विभिन्न प्रकार की योजनाएं तरकीब ला रही है, और खेती को लाभ का धंधा बनाने के प्रयास में लगी हुई है ऐसे में निचले स्तर पर बैठी स्थानीय प्रशासन, सरकार की किसान हितैषी योजनाओं के सुचारू रूप से क्रियान्वयन को अमलीजामा पहनाने में नाकाम साबित हो रही है, कहीं खाद की कालाबाजारी जिसके कारण किसान खुलेआम लुट रहे हैं तो कहीं बिजली की अघोषित कटौती इत्यादि की समस्या जिसके चलते किसानों के खेतों की सिंचाई न होने से फसल सूखने की कगार में है, ऐसे में किसानों की इस गम्भीर समस्या से परे होकर स्थानीय प्रशासन का मनमौजी तरीके से काम करने का रवैया शासन की महत्वाकांक्षी योजनाओं को पलीता लग रहा है।


आपको बता दें कि लखनादौन विकासखंड के अंतर्गत आदिवासी क्षेत्र धनककडी के अंतर्गत 25 से 30 गांव आते हैं यहां पर ज़्यादातर लोग छोटे किसान हैं जो स्वयं मेहनत मजदूरी कर खेती करके अपना भरण पोषण करते हैं, इनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण ये किसान कर (ऋण) लेकर फसल बीज, खाद की व्यवस्था कर अपने खेतों की बुवाई तो कर दिए हैं, किन्तु अब फसल को पैदा करने के लिए पानी की अत्यंत आवश्यकता है ऐसे में विगत कुछ महीने से क्षेत्र में अघोषित बिजली की कटौती के चलते किसानों की फसल जमीन पर सूख रही है किसान हताश है अन्नदाता स्वयं अपने अन्य को बचाने में असमर्थ दिखाई दे रहा है भूखे प्यासे विद्युत के इंतजार में कई घंटों तक अपने खेतों में समय बिताता है किंतु विद्युत का कोई ठिकाना नहीं रहता, घंटों इंतजार के बाद यदि विद्युत आ भी जाती है तो मुश्किल से 10 या 20 मिनट तक ही रहती है और फिर काट दी जाती है, किसान मोटर को चालू करने जाता है और बंद करने जाता है उसका और दूसरा कोई काम नहीं रहता है, अगर देखा जाए तो उसका काम सिंचाई करने का नहीं बल्कि मोटर को दिन भर चालू और बंद करने का रहता है। यह आलम यही थमने का नाम नहीं लेता, दिन में तो होती ही है कटौती, रात में भी यही आलम रहता है, अफसरशाही के चक्कर में किसान हताशा और राजनीतिक पार्टियां अपना उल्लू सीधा करने में लगी हुई है उन्हें किसानों की कोई चिंता नहीं है। जबकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और ऐसे पिछड़े क्षेत्र में इस तरह से किसानों को प्रताड़ित किया जा रहा और कोई भी अधिकारी सुध लेने को तैयार नहीं…?  वहीं जिला पंचायत अध्यक्ष के ग्रह निवास मकरझिर से धनककडी तक जो विद्युत पोल और तारे लगी हुई हैं वह कई वर्षों पुरानी और जर्जर हो चुकी हैं, बरसात के महीनों में तो चार-पांच दिन तक लाइट का ठिकाना नहीं रहता, जिससे क्षेत्र के किसानों आक्रोशित हैं तथा आंतरिक सुगबुगाहट तेजी से है कि यदि शीघ्र समस्या का निदान नहीं किया गया तो विद्युत प्रदाय केंद्र का घेराव किया जाएगा जिसका जिम्मेदार शासन और प्रशासन होगा।

 

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ग्रामीण इलाकों में विद्युत की अघोषित कटौती, फसल सूखने से चिंतित किसान

संवाददाता – मनोज उमरे की रिपोर्ट…..

धूमा। भारत एक कृषि प्रधान देश है और पूरी दुनिया भर में भारत कृषि प्रधान के नाम से जाना जाता है। जहां एक ओर केंद्र एवं राज्य की सरकारें कृषि को बढ़ावा देकर विभिन्न प्रकार की योजनाएं तरकीब ला रही है, और खेती को लाभ का धंधा बनाने के प्रयास में लगी हुई है ऐसे में निचले स्तर पर बैठी स्थानीय प्रशासन, सरकार की किसान हितैषी योजनाओं के सुचारू रूप से क्रियान्वयन को अमलीजामा पहनाने में नाकाम साबित हो रही है, कहीं खाद की कालाबाजारी जिसके कारण किसान खुलेआम लुट रहे हैं तो कहीं बिजली की अघोषित कटौती इत्यादि की समस्या जिसके चलते किसानों के खेतों की सिंचाई न होने से फसल सूखने की कगार में है, ऐसे में किसानों की इस गम्भीर समस्या से परे होकर स्थानीय प्रशासन का मनमौजी तरीके से काम करने का रवैया शासन की महत्वाकांक्षी योजनाओं को पलीता लग रहा है।


आपको बता दें कि लखनादौन विकासखंड के अंतर्गत आदिवासी क्षेत्र धनककडी के अंतर्गत 25 से 30 गांव आते हैं यहां पर ज़्यादातर लोग छोटे किसान हैं जो स्वयं मेहनत मजदूरी कर खेती करके अपना भरण पोषण करते हैं, इनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण ये किसान कर (ऋण) लेकर फसल बीज, खाद की व्यवस्था कर अपने खेतों की बुवाई तो कर दिए हैं, किन्तु अब फसल को पैदा करने के लिए पानी की अत्यंत आवश्यकता है ऐसे में विगत कुछ महीने से क्षेत्र में अघोषित बिजली की कटौती के चलते किसानों की फसल जमीन पर सूख रही है किसान हताश है अन्नदाता स्वयं अपने अन्य को बचाने में असमर्थ दिखाई दे रहा है भूखे प्यासे विद्युत के इंतजार में कई घंटों तक अपने खेतों में समय बिताता है किंतु विद्युत का कोई ठिकाना नहीं रहता, घंटों इंतजार के बाद यदि विद्युत आ भी जाती है तो मुश्किल से 10 या 20 मिनट तक ही रहती है और फिर काट दी जाती है, किसान मोटर को चालू करने जाता है और बंद करने जाता है उसका और दूसरा कोई काम नहीं रहता है, अगर देखा जाए तो उसका काम सिंचाई करने का नहीं बल्कि मोटर को दिन भर चालू और बंद करने का रहता है। यह आलम यही थमने का नाम नहीं लेता, दिन में तो होती ही है कटौती, रात में भी यही आलम रहता है, अफसरशाही के चक्कर में किसान हताशा और राजनीतिक पार्टियां अपना उल्लू सीधा करने में लगी हुई है उन्हें किसानों की कोई चिंता नहीं है। जबकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और ऐसे पिछड़े क्षेत्र में इस तरह से किसानों को प्रताड़ित किया जा रहा और कोई भी अधिकारी सुध लेने को तैयार नहीं…?  वहीं जिला पंचायत अध्यक्ष के ग्रह निवास मकरझिर से धनककडी तक जो विद्युत पोल और तारे लगी हुई हैं वह कई वर्षों पुरानी और जर्जर हो चुकी हैं, बरसात के महीनों में तो चार-पांच दिन तक लाइट का ठिकाना नहीं रहता, जिससे क्षेत्र के किसानों आक्रोशित हैं तथा आंतरिक सुगबुगाहट तेजी से है कि यदि शीघ्र समस्या का निदान नहीं किया गया तो विद्युत प्रदाय केंद्र का घेराव किया जाएगा जिसका जिम्मेदार शासन और प्रशासन होगा।

 

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